(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाभारत का अरयण्क पर्व – Mahabharat Aranyak Parv in Hindi


॥ श्रीः ॥
3.238. अध्यायः 238
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Topics
कर्णशकुनिभ्यां दुर्योधनंप्रतिस्ववैभवप्रदर्सनेन पाण्डवानां दुःखजननाय द्वैतवनगमनचोदना ॥ 1 ॥
Mahabharata - Vana Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 3-238-0x(2588)(25283)
धृतराष्ट्रस्य तद्वाक्यं निशम्य शकुनिस्तदा।
दुर्योधनमिदं काले कर्णेन सहितोऽब्रवीत् ॥ 3-238-1(25284)
प्रव्राज्य पाण्डवान्वीरान्स्वेन वीर्येण भारत।
भुङ्क्ष्वेमां पृथिवीमेको दिवि शम्बरहायथा ॥ 3-238-2(25285)
`तवाद्यपृथिवी राजन्नखिला सागराम्बरा।
सपर्वतवनाकारा सहस्थावरजङ्गमा' ॥ 3-238-3(25286)
प्राच्याश्च दाक्षिणात्याश्च पतीच्योदीच्यवासिनः।
कृताः करप्रदाः सर्वे राजानस्ते नाराधिप ॥ 3-238-4(25287)
या हि सा दीप्यमानेव पाण्डवान्भजडते पुरा।
साऽद्यलक्ष्मीस्त्वया राजन्नवाप्ता भ्रातृभिः सह ॥ 3-238-5(25288)
इन्द्रप्रस्थगते यां तां दीप्यमानां युधिष्ठिरे।
अपश्याम श्रियं राजन्सुचिरं शोककर्शिताः ॥ 3-238-6(25289)
सा तु बुद्धिबलेनेयं राज्ञस्तस्मात्तथाविधात्।
त्वयाक्षिप्ता महाबाहो दीप्यमानेव दृश्यते ॥ 3-238-7(25290)
तथैव तव राजेन्द्रराजानः परवीरहन्।
शासनेऽधिष्ठिताः सर्वेकिं कुर्म इति वादिनः ॥ 3-238-8(25291)
ते वयं पृथिवी राजन्निखिला सागराम्बरा।
सपर्वतवना देवी सग्रामनगराकरा ॥ 3-238-9(25292)
नानावनोद्देशवती पत्तनैरुपशोभिता।
`नानाजनपदाकीर्णा स्फीतराष्ट्रा महाहला' ॥ 3-238-10(25293)
नन्द्यमानो द्विजै राजन्भासि नक्षत्रराडिव।
पौरुषाद्दिवि देवेषु भ्राजसे रश्मिवानिव ॥ 3-238-11(25294)
रुद्रैरिव यमो राजा मरुद्भिरिव वासवः।
कुरुभिस्त्वं वृतो राजन्भासि नक्षत्रराडिव ॥ 3-238-12(25295)
यैः स्म ते नाद्रियेताज्ञा न च ये शासने स्थिताः।
पश्यामस्ताञ्श्रिया हीनान्पाण्डवान्वनवासिनः ॥ 3-238-13(25296)
श्रूयते हि महाराजसरो द्वैतवनं प्रति।
वसन्तः पाण्डवाः सार्धं ब्राह्मणैर्वनवासिभिः ॥ 3-238-14(25297)
सप्रयाहि महाराज श्रिया परमया युतः।
तापयन्पाण्डुपुत्रांस्त्वं रश्मिवानिव तेजसा ॥ 3-238-15(25298)
स्तितोराज्येऽच्युतान्राज्याच्छियाहीनाञ्छ्रियावृतः
असमृद्धान्समृद्धार्थः पश्य पाण्डुसुतान्नृप ॥ 3-238-16(25299)
महाभिजनसंपन्नं भद्रे महति संस्थितम्।
पाण्डवास्त्वाऽभिवीक्षन्तु ययातिमिव नाहुषां ॥ 3-238-17(25300)
यां श्रियं सुहृदश्चैव दुर्हृदश्च विशांपते।
पश्यन्ति पौरुषैर्दीप्तां सा समर्था भवत्युत ॥ 3-238-18(25301)
समस्थो विषमस्थान्हि दुर्हृदो योऽभिवीक्षते।
जगतीस्थनिवाद्रिस्थः किमतः परमं सुखम् ॥ 3-238-19(25302)
न पुत्रधनलाभेन न राज्येनापि विन्दति।
प्रीतिं नृपतिशार्दूल याममित्राधदर्शनात् ॥ 3-238-20(25303)
किंनु तस्य सुखं न स्यादाश्रमे यो धनंजयम्।
अभिवीक्षेत सिद्धार्थो वल्कलाजिनवाससम् ॥ 3-238-21(25304)
सुवाससो हि ते भार्या वल्कलाजिनसंवृताम्।
पश्यन्तु दुःखितां कृष्णां सा च निर्विद्यतां पुनः ॥ 3-238-22(25305)
विनिन्दतां तथाऽत्मानं जीवितं च धनच्युतम्।
`दाराणां ते श्रियं दृष्ट्वा दीप्तामद्य जनाधिपा' ॥ 3-238-23(25306)
न तथा हिसभामध्ये तस्या भवितुमर्हति।
वैमनस्यं यथा दृष्ट्वा तव भार्याः स्वलंकृताः ॥ 3-238-24(25307)
वैशम्पायन उवाच। 3-238-25x(2589)
एवमुक्त्वा तु राजानं कर्णः शकुनिना सह।
तूष्णीं बभूवतुरुभौ दाक्यान्ते जनमेजय ॥ 3-238-25(25308)

इति श्रीमन्महाबारते अरण्यपर्वणि धोयात्रापर्वणि अष्टत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ 238 ॥

Mahabharata - Vana Parva - Chapter Footnotes
3-238-4 प्रतीच्या उदीच्याश्च देशास्तद्वासिनः। ते त्वया ॥ 3-238-13 नाद्रियेत नादृता ॥ 3-238-17 त्वा त्वाम् ॥ 3-238-18 समर्था सुहृदां हर्षं शत्रूणां च शोकं दातुमिति शेषः ॥ 3-238-20 अघं दुःखम् ॥ 3-238-22 निर्विद्यतां जीवितादपि विरक्ता भवतु ॥


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